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एक मुंह के मीठे और दिल के खोटे मनुष्य ने रास्ते के बीच में कांटों की झाड़ी उगने दी। जो पथिक उधर से निकलता, वही धिक्कार कर कहता कि इसको उखाड़ दे; लेकिन उसको वह उखाड़ता नहीं था, न उखाड़ा। इस झाड़ी की यह दशा थी कि प्रत्येक पल बढ़ती जाती थी और लोगों के पैर कांटे चुभने से लहू-लुहान हो जाते। जब हाकिम को इसकी खबर पहुंची और इस मनुष्य के पूर्ण आचरण का ज्ञान हुआ तो उसने झाड़ी को तुरन्त उखाड़ देने की आज्ञा दी। इस पर भी वह मनुष्य और जवाब दिया कि किसी फुर्सत के दिन उखाड़ डालूंगा। इस तरह बराबर टालमटोल करता रहा, यहां तक कि झाड़ी ने खूब मजबूत जड़ पकड़ ली।

[हजरत ईसा की तरह मूर्खों से दूर भागना चाहिए। मूर्खों के संग ने बड़े-बड़े झगड़े पैदा किये है। जिस तरह हवा आहिस्ता-आहिस्ता पानी को खुश्क कर देती हैं, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी धीरे-धीरे प्रभाव डालते है और इसका अनुभव नहीं होता।]१

भला बता तो सही, स्त्री-हत्या का पाप किसी भी जन्म में धो सकेगा? बात क्या थी और उसने क्या अपराध किया था?"

बोला "महाराज! ईश्वर जानता है कि मुझे खबर नहीं थी। ऐ दयालु, मुझे

प्रेमपात्र ने कहा, "तुम्हें लौट जाना चाहिए। अभी भेंट नहीं हो सकती। तुम जैसी कच्ची चीज के लिए यहां स्थान नहीं।"

तू कबतक झूठ बोलता रहेगा? तू बड़ा कपटी है।"

जब मूसा ने अदृष्ट से ये शब्द सुने तो व्याकुल होकर जंगल की तरफ चरवाहे की तलाश में निकले। उसके पद-चिह्नों को देखते हुए सारे जंगल की खाक छान डाली। आखिर उसे तलाश कर लिया। मिलन पर कहा, "तू बड़ा भाग्यवान है। तुझे आज्ञा मिल गयी। तुझे किसा शिष्टाचार या नियम की click here आवश्यकता नहीं। जो तेरे जी में आये, कहा। तेरा कुफ्र धर्म और तेरा धर्म ईश्वर-प्रेम है। इसलिए तेरे लिए सबकुछ माफ है बल्कि तेरे दम से ही सृष्टि कायम है। ऐ मनुष्य!

एक आदमी सोना तोलने के लिए सुनार के पास तराजू मांगने आया। सुनार ने कहा, "मियां, अपना रास्ता लो। मेरे पास छलनी नहीं है।"

इस पहलवान के जितने निकट संबंधी और सजातीय थे, सबने उसी वक्त हजरत अली का धर्म ग्रहण कर लिया। हजरत अली ने केवल दया की तलवार से इतने बड़े दल को here अपने धर्म में दीक्षित कर लिया।

[बाज की तरह आदमी भी, अपने स्वामी परमात्मा को छोड़कर दु:ख उठाता हैं। संसार की माया उसे पंगु बना देती है और मूर्ख मनुष्य अपनी मूर्खता के कामों को भी बुद्धिमानी का कार्य समझते हैं।] १

उसने पानी की मशक उठायी और चल दिया। सफर में दिन को रात और रात को दिन कर दिया। उसको यात्रा के कष्टों के समय भी मशक की हिफाजत का ही ख्याल रहता था।

इस तरह सलाह करके ये लोग वहां से चले। जब बादशाह के महल के पास पहुंचे तो कुत्ता भूंका। चोर ने कुत्ते की बोली पहचानकर साथियों से कहा click here कि यह कह रहा है कि बादशाह हैं। इसलिए सावधान होकर चलना चाहिए। मगर उसकी बात किसीने नहीं मानी। जब नेता आगे बढ़ता चला गया तो दूसरों ने भी उसके संकेत की कोई परवा नहीं की। बादशाह के महल के नीचे पहुंचकर सब रुक गये और वहीं चोरी करने का इरादा किया। दूसरा चोर उछलकर महल पर चढ़ गया। और फिर उसने बाकी चोरों को भी खींच लिया। महल के भीतर घुसकर सेंध लगायी और खूब लूट हुई। जिसके जो हाथ लगा, समेटता गया। जब लूट चुके तो चलने की तैयारी हुई। जल्दी-जल्दी नीचे उतरे और अपना-अपना रास्ता लिया। बादशाह ने सबका नाम-धाम पूछ लिया था। चोर माल-असबाब लेकर चंपत हो गये।

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लोभ से आया था, परन्तु जब यहां पहुंचा तो इसके दर्शनों के लिए उत्कण्ठित हो गया।" फिर पानी की मशक देकर कहा, "इस नजराने को सुलतान की सेवा में पहुंचाओ और निवेदन करो कि मेरी यह तुच्छ भेंट किसी मतलब के लिए नहीं है। यह भी अर्ज करना कि यह मीठा पानी सौंधी मिट्टी के घड़े का है, जिसमें बरसाती पानी इकट्ठा किया गया था।"

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